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कारगिल विजय दिवस विशेष: मेरठ के पांच वीर सपूत, जिन्होंने मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते न्योछावर कर दी जान मेरठ।

कारगिल विजय दिवस विशेष: मेरठ के पांच वीर सपूत, जिन्होंने मातृभूमि के लिए हंसते-हंसते न्योछावर कर दी जान  मेरठ।

मेरठ। 26 जुलाई सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के शौर्य, बलिदान और विजय का प्रतीक है। 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन को करारी शिकस्त दी और तिरंगे की आन-बान-शान को कायम रखा। इस विजय की कीमत देश ने अपने 527 से अधिक वीर सपूतों के सर्वोच्च बलिदान से चुकाई।

इस युद्ध में मेरठ के पांच जांबाजों ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज भी उनके परिवारों की आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन सीना गर्व से चौड़ा हो उठता है। कारगिल विजय दिवस पर आइए उन अमर वीरों को नमन करें।

1. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव

टाइगर हिल की लड़ाई कारगिल युद्ध की सबसे कठिन लड़ाइयों में गिनी जाती है। दुश्मन ऊंची चोटियों पर था और भारतीय जवान नीचे से आगे बढ़ रहे थे। इसी दौरान हस्तिनापुर के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव और उनके साथियों ने दुश्मन के बंकरों पर धावा बोलकर उन्हें ध्वस्त कर दिया। वीरता से लड़ते हुए उन्होंने कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया और 5 जुलाई 1999 को देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनके परिवार को आज भी उनकी बहादुरी पर गर्व है।

2. मेजर मनोज तलवार

मवाना रोड स्थित डिफेंस कॉलोनी निवासी मेजर मनोज तलवार ने खुद सियाचिन में तैनाती की इच्छा जताई थी। कारगिल युद्ध शुरू होने पर उनकी यूनिट को टुरटुक सेक्टर भेजा गया। 13 जून 1999 को उन्होंने वहां तिरंगा फहराया, लेकिन उसी दौरान दुश्मन की गोलाबारी में वीरगति को प्राप्त हो गए। उनका बलिदान आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है।

3. हवलदार यशवीर सिंह

तोलोलिंग की लड़ाई में हवलदार यशवीर सिंह ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। सीने में गोलियां लगने के बावजूद उन्होंने ग्रेनेड लेकर दुश्मन के बंकरों पर हमला जारी रखा। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी लड़ते रहे और मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी वीरता भारतीय सेना के इतिहास में हमेशा याद की जाएगी।

4. लांस नायक सत्यपाल सिंह

मूल रूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांस नायक सत्यपाल सिंह की यूनिट ने तोलोलिंग पर विजय हासिल की। इसके बाद 28 जून 1999 को द्रास सेक्टर में दुश्मनों से लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय उनके दोनों बच्चे बेहद छोटे थे, लेकिन आज पूरा परिवार उनके बलिदान पर गर्व करता है।

5. जुबैर अहमद

मेरठ के ललियाना गांव से जुड़े जुबैर अहमद 22 ग्रेनेडियर्स में तैनात थे। कारगिल युद्ध शुरू होने पर उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया और मोर्चे पर चले गए। 3 जुलाई 1999 को हिंद पहाड़ी पर लड़ते हुए उन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। आज उनके बच्चे अपने पिता की वीरता को अपनी सबसे बड़ी विरासत मानते हैं।

कारगिल युद्ध एक नजर में
. 3 मई 1999 को घुसपैठ का पता चला।
. करीब दो महीने तक भीषण युद्ध चला।
. 26 जुलाई 1999 को भारत ने निर्णायक विजय हासिल की।
. युद्ध में 527 से अधिक भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए और 1300 से अधिक घायल हुए।

The Nation Eye की ओर से श्रद्धांजलि
कारगिल की जीत सिर्फ सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि भारत के उन अमर वीरों की अमिट गाथा है जिन्होंने तिरंगे की शान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। मेरठ के इन पांच वीर सपूतों का बलिदान हमेशा देशवासियों को राष्ट्रभक्ति, साहस और कर्तव्य की प्रेरणा देता रहेगा।

विनम्र श्रद्धांजलि। जय हिंद। 🇮🇳