नई दिल्ली। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में एक तस्वीर ने नई चर्चा छेड़ दी है। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत और गौरव टिकैत ने केंद्रीय राज्यमंत्री एवं रालोद अध्यक्ष जयन्त चौधरी से उनके दिल्ली स्थित आवास पर मुलाकात की। इस दौरान जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिन्दर सिंह भी मौजूद रहे।
टिकैत परिवार इस मुलाकात को पूरी तरह शिष्टाचार भेंट बता रहा है, लेकिन पश्चिमी यूपी की राजनीति को करीब से देखने वाले इसके सियासी मायने भी तलाश रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह जयन्त चौधरी और टिकैत परिवार के रिश्तों का पिछले कुछ वर्षों का उतार-चढ़ाव है।
NDA में जाने के बाद बढ़ी दूरी
सियासी तस्वीर उस समय बदल गई जब जयन्त चौधरी ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर NDA का हिस्सा बनने का फैसला किया। इसके बाद टिकैत परिवार और जयन्त के बीच पहले जैसी गर्मजोशी सार्वजनिक तौर पर कम दिखाई दी।
इस दौरान बिना नाम लिए तंज भी सामने आए। चौधरी नरेश टिकैत ने जयन्त की ओर इशारा करते हुए ‘हलवाई का ततैया’ वाली टिप्पणी की थी। इसके जवाब में जयन्त चौधरी ने भी कहा था कि उन्हें मीठा पसंद नहीं है। हालांकि बाद में राकेश टिकैत ने रिश्तों में तल्खी की अटकलों को कम करते हुए कहा था कि वे सब एक हैं।
अब जयन्त के घर पहुंचे राकेश और गौरव
इसी पृष्ठभूमि के कारण सोमवार की मुलाकात महत्वपूर्ण हो जाती है। लंबे समय से दोनों पक्षों की ऐसी तस्वीर सामने नहीं आई थी। अब राकेश टिकैत और गौरव टिकैत का जयन्त चौधरी के दिल्ली आवास पहुंचना यह संकेत जरूर देता है कि संवाद के रास्ते खुले हुए हैं।
हालांकि गौरव टिकैत ने मुलाकात के पीछे किसी राजनीतिक कारण से इनकार किया है। उनके मुताबिक जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री सुरिन्दर सिंह को अपने राज्य से जुड़े कुछ मुद्दों पर जयन्त चौधरी से बात करनी थी। वे उन्हीं के साथ गए थे। मुलाकात में सामाजिक विषयों पर चर्चा हुई और राजनीति या किसान आंदोलन को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई।
फिर सियासी मायने क्यों?
इसकी वजह पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मौजूदा राजनीतिक माहौल है। 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। रालोद NDA का हिस्सा है और पश्चिमी यूपी के किसान तथा जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत राजनीतिक जमीन रही है। वहीं टिकैत परिवार और भारतीय किसान यूनियन का भी इसी क्षेत्र के किसानों के बीच प्रभाव है।
ऐसे में जयन्त चौधरी और टिकैत परिवार के रिश्तों में किसी भी तरह की नरमी का असर केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित मानकर नहीं देखा जाएगा।
क्या पिघल रही है रिश्तों की बर्फ?
फिलहाल इस एक मुलाकात के आधार पर किसी नए राजनीतिक समीकरण या समझौते का दावा करना जल्दबाजी होगी। टिकैत परिवार ने भी साफ तौर पर राजनीतिक बातचीत से इनकार किया है।
लेकिन राजनीति में तस्वीरों के भी अपने संदेश होते हैं। NDA में जयन्त चौधरी के जाने के बाद जिस टिकैत परिवार से उनकी दूरी की चर्चा होती रही, उसी परिवार के राकेश और गौरव टिकैत का अब उनके घर पहुंचना इतना जरूर बताता है कि रिश्तों के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं।
अब सवाल यही है—क्या यह सिर्फ शिष्टाचार की एक तस्वीर है, या पश्चिमी यूपी में 2027 से पहले बदलते रिश्तों की शुरुआत? इसका जवाब आने वाले दिनों की राजनीति देगी। आपका क्या मानना है ?