चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक शिष्य रहे मुलायम सिंह यादव ने 1989 में बेटे अजित सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचने दिया था, अब अखिलेश के बयान पर पश्चिमी यूपी में फिर छिड़ी पुरानी सियासी कहानी
दिल्ली/लखनऊ। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के एक ताजा बयान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में करीब चार दशक पुरानी सियासी कहानी फिर जिंदा कर दी है।
अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए केंद्रीय मंत्री एवं राष्ट्रीय लोकदल अध्यक्ष जयंत चौधरी पर तंज कसते हुए कहा—हम लोगों ने चवन्नी का रुपया बना दिया, तब भी हमें छोड़कर चले गए।
बयान ताजा है, लेकिन इसकी गूंज पश्चिमी यूपी में 1989 की उस सियासी लड़ाई तक पहुंच रही है, जब एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजित सिंह थे और दूसरी तरफ चरण सिंह की राजनीतिक धारा में आगे बढ़े उनके शिष्य मुलायम सिंह यादव।
रालोद की पुरानी पीढ़ी में आज एक बार फिर वही सवाल उठ रहा है—क्या इतिहास की वही सियासी लड़ाई अब दूसरी पीढ़ी में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच नए रूप में सामने आ रही है?
चवन्नी कहकर जयंत की राजनीतिक हैसियत पर सवाल?
अखिलेश यादव के बयान के राजनीतिक मायने सिर्फ इतने नहीं हैं कि जयंत चौधरी सपा का साथ छोड़कर एनडीए में चले गए।
सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, चवन्नी।
यानी सपा मुखिया के बयान का राजनीतिक संदेश यह निकाला जा रहा है कि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के दौरान रालोद को उसकी वास्तविक राजनीतिक ताकत से ज्यादा हिस्सेदारी और सम्मान देकर चवन्नी से रुपया बनाया।
यही बात रालोद के पुराने समर्थकों को सबसे ज्यादा चुभ सकती है।
क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी परिवार की राजनीति समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन से शुरू नहीं हुई। इसके पीछे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की दशकों पुरानी किसान राजनीति और उसके बाद चौधरी अजित सिंह की लंबी राजनीतिक विरासत रही है।
कहानी को समझना है तो करीब चार दशक पीछे जाना होगा
अखिलेश के आज के तंज के पीछे छिपी राजनीतिक तल्खी को समझने के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति के उस दौर में लौटना जरूरी है, जब मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजित सिंह आमने-सामने आए थे।
मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक उभार चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक धारा में हुआ। चरण सिंह के साथ उनके राजनीतिक रिश्ते इतने गहरे थे कि मुलायम को उनके प्रमुख राजनीतिक शिष्यों में गिना जाता रहा।
लेकिन चौधरी चरण सिंह के बाद तस्वीर बदलने लगी।
चौधरी अजित सिंह राजनीति में सक्रिय हुए तो चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का सवाल भी खड़ा हुआ। अजित सिंह 1986 में राज्यसभा पहुंचे और इसके बाद तेजी से राष्ट्रीय और उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण चेहरा बन गए।
फिर आया 1989।
जनता दल उत्तर प्रदेश में सत्ता में आया और मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चौधरी अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव आमने-सामने खड़े हो गए।
मुकाबला विधायक दल तक पहुंचा और अंततः मुलायम सिंह यादव ने अजित सिंह को पीछे छोड़ दिया। 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव ने पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
यही वह घटना थी जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में चौधरी परिवार और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक राहें अलग करने वाली सबसे गहरी लकीरों में से एक खींच दी।
पुराने रालोदियों के दिल में आज भी टीस
रालोद की पुरानी पीढ़ी के लिए यह सिर्फ मुख्यमंत्री पद की एक पुरानी राजनीतिक लड़ाई नहीं थी।
उनकी भावनाओं में सवाल इससे कहीं बड़ा रहा—जिस चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव को अपनी राजनीतिक छांव में आगे बढ़ाया, उन्हीं चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मुलायम सिंह बनकर क्यों खड़े हुए?
इसीलिए पुराने रालोद समर्थकों का एक वर्ग 1989 की घटना को आज भी सामान्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की तरह नहीं देखता। उनकी भाषा में वह चौधरी अजित सिंह की पीठ में सियासी छुरा घोंपने जैसा था।
इतिहास का तथ्य यह है कि दोनों के बीच सत्ता और नेतृत्व की जबरदस्त राजनीतिक लड़ाई हुई और मुलायम सिंह यादव उसमें विजेता बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। लेकिन उस घटनाक्रम को लेकर रालोद समर्थकों की भावनाएं आज भी कहीं ज्यादा तीखी हैं।
तब मुलायम-अजित… अब अखिलेश-जयंत
और अब कहानी करीब चार दशक बाद दूसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है।
मुलायम सिंह यादव की जगह उनके बेटे अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं और चौधरी अजित सिंह की राजनीतिक विरासत उनके बेटे जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं।
एक समय अखिलेश और जयंत की जोड़ी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती देने के लिए साथ खड़ी दिखाई देती थी।
लेकिन जयंत चौधरी के एनडीए में जाने के बाद रास्ते अलग हो गए।
अब अखिलेश का चवन्नी का रुपया बना दिया वाला तंज यह बता रहा है कि दोनों दलों के बीच सिर्फ राजनीतिक दूरी नहीं बढ़ी है, बल्कि तल्खी भी खुलकर सामने आने लगी है।
सबसे बड़ा सवाल—जयंत चवन्नी थे तो गठबंधन में इतने जरूरी क्यों थे?
यहीं अखिलेश यादव के बयान पर एक राजनीतिक सवाल भी खड़ा होता है।
अगर रालोद की ताकत चवन्नी भर थी तो समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी को अपना प्रमुख सहयोगी क्यों बनाया था?
क्योंकि हकीकत यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट-किसान बेल्ट में चौधरी परिवार की अपनी राजनीतिक पहचान है। आज एनडीए भी जयंत चौधरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान दे रहा है। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में भी उनकी भूमिका और पश्चिमी यूपी में एनडीए के लिए उनकी उपयोगिता लगातार चर्चा में रही है।
इसलिए अखिलेश का एक तंज उल्टा रालोद को भी राजनीतिक हथियार दे सकता है।
चवन्नी का जवाब अब 2027 की राजनीति देगी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ रहा है। ऐसे में यह बयान सिर्फ दो नेताओं के बीच जुबानी जंग मानकर छोड़ देना जल्दबाजी होगी।
सपा को पश्चिमी यूपी में अपना जनाधार मजबूत करना है। दूसरी तरफ जयंत चौधरी एनडीए के साथ खड़े होकर उसी इलाके में अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाना चाहते हैं।
इसलिए मुकाबला केवल अखिलेश बनाम जयंत नहीं है।
इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, जाट, मुस्लिम, पिछड़े और युवा मतदाताओं का बड़ा चुनावी गणित है।
और इतिहास का संयोग देखिए—
1989 में चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के सामने उनके पिता की राजनीतिक धारा से निकले मुलायम सिंह यादव खड़े थे।
2026 में अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी पर मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव चवन्नी का रुपया वाला तंज कस रहे हैं।
करीब चार दशक में चेहरे बदल गए, पार्टियों के गठबंधन बदल गए और राजनीतिक परिस्थितियां भी पूरी तरह बदल गईं।
लेकिन अखिलेश के एक चवन्नी वाले बयान ने पश्चिमी यूपी में मुलायम-अजित की पुरानी सियासी लड़ाई की यादें फिर ताजा कर दी हैं। अब सवाल यही है—क्या यह सिर्फ एक तंज है, या 2027 से पहले अखिलेश और जयंत के बीच शुरू हो रही एक लंबी राजनीतिक लड़ाई का आगाज?
हालांकि रालोद में कुछ नेता वह भी अब साथ हैं जो अजीत सिंह के खिलाफ थे, जिन्होंने उनको मुख्यमंत्री नहीं बनने देने में अहम भूमिका निभाई थी। जयंत चौधरी शायद इन बातों को भूल गए हैं, लेकिन अजीत सिंह होते तो…
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