Saturday, 26 September 2026 |  मेरठ, उत्तर प्रदेश
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पश्चिमी यूपी में जयंत की लंबी सियासी बिसात, 23 दिसंबर को नूरपुर में बड़ा कार्यक्रम, क्या सपा के समीकरणों पर बढ़ेगा दबाव?

पश्चिमी यूपी में जयंत की लंबी सियासी बिसात, 23 दिसंबर को नूरपुर में बड़ा कार्यक्रम, क्या सपा के समीकरणों पर बढ़ेगा दबाव?

सहारनपुर से मुजफ्फरनगर और अब सादाबाद-फतेहपुर सीकरी तक कार्यक्रमों की श्रृंखला, चवन्नी और ABCD पर अखिलेश-सपा को जवाब, जाट आधार से आगे दलित-पिछड़े समेत सर्वसमाज तक पहुंच बढ़ाने की कवायद

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केंद्रीय राज्यमंत्री एवं रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी ने आने वाले महीनों के लिए राजनीतिक-सामाजिक कार्यक्रमों की लंबी श्रृंखला का संकेत दे दिया है। मुजफ्फरनगर के सामाजिक समरसता सम्मेलन के मंच से जयंत ने लोगों को 23 दिसंबर को चौधरी चरण सिंह की जयंती पर उनके गांव नूरपुर में होने वाले कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। इससे पहले सादाबाद में राजा महेंद्र प्रताप की स्मृति में पदयात्रा और 12 अक्टूबर को आगरा के फतेहपुर सीकरी में स्वाभिमान रैली होगी।

इन कार्यक्रमों को केवल रालोद के संगठनात्मक आयोजनों के तौर पर नहीं देखा जा रहा। सहारनपुर के स्वाभिमान सम्मेलन से मुजफ्फरनगर के सामाजिक समरसता सम्मेलन तक जयंत के भाषणों में सामाजिक सम्मान और अलग-अलग समाजों को साथ जोड़ने पर लगातार जोर दिखाई दिया है। इसी दौरान समाजवादी पार्टी के साथ उनकी राजनीतिक तल्खी भी खुलकर सामने आई है।

अखिलेश और सपा प्रदेश अध्यक्ष पर एक के बाद एक सियासी तीर

अखिलेश यादव के ‘चवन्नी’ वाले तंज से शुरू हुई जुबानी जंग अब सपा प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के राजनीति की ‘ABCD’ वाले बयान तक पहुंच चुकी है। मुजफ्फरनगर में जयंत ने बिना नाम लिए सवाल किया कि आखिर किस समाज को नीचे से उठाकर बड़ा बनाने की बात कही जा रही है। उन्होंने अपने प्रदेश अध्यक्ष ऐश्वर्यराज सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी पार्टी में किसी समाज पर ऐसी टिप्पणी स्वीकार नहीं की जाएगी।

जयंत ने अखिलेश यादव की टी-शर्ट के रंग को लेकर भी कटाक्ष किया और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबा साहेब किसी एक रंग तक सीमित नहीं हैं।

जाट-किसान से आगे ‘सर्वसमाज’ की तरफ नजर

यहीं जयंत की मौजूदा रणनीति का बड़ा सियासी पहलू दिखाई देता है। रालोद का मजबूत आधार पश्चिमी यूपी के किसान और जाट मतदाताओं में रहा है, लेकिन हाल के कार्यक्रमों में पार्टी दलित, पिछड़े, गुर्जर, ठाकुर, त्यागी, ब्राह्मण समेत अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने का संदेश दे रही है।

चौधरी चरण सिंह की विरासत के साथ बाबा साहेब आंबेडकर और राजा महेंद्र प्रताप जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उल्लेख भी रालोद के कार्यक्रमों में प्रमुखता से सामने आ रहा है। इसे पार्टी के सामाजिक संवाद का दायरा बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

सपा के PDA के सामने रालोद का ‘स्वाभिमान-समरसता’ अभियान

सपा जहां PDA को अपनी प्रमुख राजनीतिक रणनीति के रूप में आगे बढ़ा रही है, वहीं जयंत के हालिया कार्यक्रमों में ‘स्वाभिमान’, ‘सामाजिक समरसता’ और ‘सम्मान’ जैसे मुद्दे केंद्र में हैं। दोनों दल कभी पश्चिमी यूपी में गठबंधन के साथ चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन अब उनके बीच सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक विरासत को लेकर खुली बयानबाजी हो रही है।

2027 में इन कार्यक्रमों का चुनावी असर कितना होगा, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन सहारनपुर से मुजफ्फरनगर, सादाबाद और फतेहपुर सीकरी होते हुए 23 दिसंबर को नूरपुर तक तैयार किए जा रहे कार्यक्रमों के सिलसिले से इतना जरूर स्पष्ट है कि रालोद पश्चिमी यूपी में लगातार राजनीतिक-सामाजिक मौजूदगी बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। सपा और रालोद के बीच चल रही जुबानी जंग के बीच अब नजर इस बात पर रहेगी कि जमीन पर दोनों दल अपने-अपने सामाजिक गठजोड़ को कितना विस्तार दे पाते हैं.