पाकिस्तान के पैटन टैंकों पर भारी पड़ा भारत का वीर सपूत, आज ही के दिन वीर अब्दुल हमीद ने दिया था सर्वोच्च बलिदा
नई दिल्ली। भारतीय सेना के इतिहास में 10 सितंबर की तारीख अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान की एक ऐसी कहानी समेटे हुए है, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में इसी दिन कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद खेमकरण सेक्टर में पाकिस्तानी सेना के अत्याधुनिक पैटन टैंकों से मुकाबला करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनके असाधारण साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
गाजीपुर के छोटे से गांव से निकला भारत का परमवीर
अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। उनके पिता मोहम्मद उस्मान दर्जी का काम करते थे और मां का नाम सकीना बेगम था। साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल हमीद ने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की और कुछ समय पिता के काम में भी हाथ बंटाया। बाद में उन्होंने सेना को अपना जीवन चुना। उनकी पत्नी का नाम रसूलन बीबी था।
अब्दुल हमीद सेना में भर्ती होने के बाद ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट से जुड़े और आगे चलकर 4 ग्रेनेडियर्स में तैनात हुए। वे रीकॉइललेस गन चलाने में बेहद दक्ष माने जाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान भी उनकी बटालियन ने युद्ध में हिस्सा लिया था।
जब सामने आए पाकिस्तान के पैटन टैंक
सितंबर 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पंजाब का खेमकरण सेक्टर भीषण लड़ाई का केंद्र बन गया। पाकिस्तान ने अमेरिकी मूल के शक्तिशाली Patton tanks के साथ बड़ा बख्तरबंद हमला किया था। भारतीय सेना की 4 ग्रेनेडियर्स को असल उत्तर और चीमा क्षेत्र के आसपास महत्वपूर्ण मोर्चे की रक्षा करनी थी।
यहीं अब्दुल हमीद की वीरता इतिहास बन गई।
वे जीप पर लगी 106 mm recoilless gun के साथ दुश्मन के टैंकों का मुकाबला कर रहे थे। भारी गोलाबारी के बीच वे लगातार अपनी पोजीशन बदलते और पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाते रहे। उनके हमलों में कई पैटन टैंक तबाह हुए और पाकिस्तानी बख्तरबंद दस्ते की बढ़त को रोकने में भारतीय सेना को बड़ी मदद मिली।
10 सितंबर की सुबह और आखिरी मुकाबला
10 सितंबर 1965 की सुबह पाकिस्तान ने एक बार फिर टैंकों और तोपखाने के साथ बड़ा हमला किया। दुश्मन के टैंक भारतीय मोर्चों की तरफ बढ़ रहे थे। अब्दुल हमीद ने अपनी जान की परवाह किए बिना रीकॉइललेस गन से उनका सामना किया।
उन्होंने एक टैंक को निशाना बनाया, फिर अपनी जगह बदली और दूसरे टैंक पर हमला किया। लगातार कार्रवाई करते हुए उनकी जीप दुश्मन की नजर में आ गई। पाकिस्तानी टैंक और अब्दुल हमीद आमने-सामने आ गए। अब्दुल हमीद ने पीछे हटने के बजाय फिर निशाना साधा। इसी मुकाबले में दुश्मन की गोलाबारी से वे गंभीर रूप से घायल हुए और 10 सितंबर 1965 को वीरगति प्राप्त कर गए।
उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। 4 ग्रेनेडियर्स और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी हमले को रोक दिया। असल उत्तर की लड़ाई 1965 के युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण टैंक लड़ाइयों में गिनी जाती है और 4 ग्रेनेडियर्स को इसके लिए Battle Honour “Asal Uttar” मिला।
मरणोपरांत मिला परमवीर चक्र
अब्दुल हमीद के असाधारण साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। यह भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है। उनकी वीरता ने उन्हें भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित योद्धाओं में शामिल कर दिया।
आज भी पंजाब में चीमा गांव के पास खेमकरण-भिखीविंड रोड पर उनकी स्मृति से जुड़ा युद्ध स्मारक मौजूद है, जहां उनकी शहादत और असल उत्तर के रणबांकुरों को याद किया जाता है।
10 सितंबर केवल एक शहादत की तारीख नहीं है—यह उस सैनिक को याद करने का दिन है जिसने आधुनिक पैटन टैंकों के सामने सीमित संसाधनों के बावजूद मोर्चा नहीं छोड़ा और मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। वीर अब्दुल हमीद की कहानी आज भी भारतीय सेना के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है।