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24 की उम्र में देश पर कुर्बान हुआ ‘शेरशाह’, प्रेमिका ने फिर नहीं की शादी, आज कैप्टन विक्रम बत्रा की जयंती

24 की उम्र में देश पर कुर्बान हुआ ‘शेरशाह’, प्रेमिका ने फिर नहीं की शादी, आज कैप्टन विक्रम बत्रा की जयंती

•पालमपुर, हिमाचल प्रदेश। ये दिल मांगे मोर… यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि कारगिल युद्ध के महानायक कैप्टन विक्रम बत्रा की पहचान बन गया। आज 9 सितंबर को उनकी जयंती है। 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा महज 24 साल की उम्र में कारगिल की चोटियों पर लड़ते हुए शहीद हो गए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

शिक्षक माता-पिता के घर जन्मे थे विक्रम

विक्रम बत्रा के पिता गिरधारी लाल बत्रा शिक्षक और बाद में स्कूल प्रिंसिपल रहे, जबकि मां कमल कांता बत्रा शिक्षिका। विक्रम और उनके जुड़वां भाई विशाल बत्रा का जन्म पालमपुर में हुआ। परिवार में दो बड़ी बहनें भी।

विक्रम बचपन से ही खेलकूद और दूसरी गतिविधियों में सक्रिय थे। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उन्होंने NCC में भी हिस्सा लिया। उनके सामने मर्चेंट नेवी में करियर बनाने का विकल्प भी था, लेकिन आखिरकार उन्होंने सेना को चुना।

13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स से शुरू हुआ ‘शेरशाह’ का सफर

भारतीय सैन्य अकादमी में प्रशिक्षण के बाद विक्रम बत्रा भारतीय सेना की 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स (13 JAK RIF) में शामिल हुए। कारगिल युद्ध के दौरान उनका कोड नेम ‘शेरशाह’ था। यही नाम बाद में उनकी बहादुरी का पर्याय बन गया।

कारगिल युद्ध में कैप्टन बत्रा और उनकी टीम को सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण प्वाइंट 5140 को दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने का मिशन मिला। दुर्गम पहाड़, जमा देने वाली ठंड और ऊंचाई पर बैठे दुश्मन के बावजूद भारतीय जवान आगे बढ़े।

प्वाइंट 5140 जीतकर बोले—’ये दिल मांगे मोर’

जून 1999 में कैप्टन बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने प्वाइंट 5140 पर कब्जा कर लिया। इस जीत के बाद उनका विजय संदेश ये दिल मांगे मोर” पूरे देश में गूंज उठा। इसके बाद विक्रम बत्रा कारगिल युद्ध के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हो गए।

लेकिन उनके लिए लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई थी। अगला बड़ा लक्ष्य था प्वाइंट 4875।

साथी को बचाते हुए लड़े, 7 जुलाई को हुए शहीद

प्वाइंट 4875 की लड़ाई बेहद कठिन थी। 7 जुलाई 1999 को कैप्टन बत्रा अपने जवानों के साथ दुश्मन के बेहद करीब पहुंच गए। परमवीर चक्र के आधिकारिक विवरण के अनुसार उन्होंने बेहद नजदीकी लड़ाई में दुश्मन सैनिकों को मार गिराया और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद अपने जवानों का नेतृत्व जारी रखा।

इसी भीषण संघर्ष में कैप्टन विक्रम बत्रा ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी उम्र उस समय महज 24 वर्ष थी। प्वाइंट 4875 बाद में उनके सम्मान में ‘बत्रा टॉप’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अधूरी रह गई विक्रम और डिंपल की प्रेम कहानी

विक्रम बत्रा की जिंदगी का दूसरा पहलू उनकी प्रेमिका डिंपल चीमा से जुड़ा है। दोनों की मुलाकात कॉलेज के दिनों में हुई थी और दोनों शादी करना चाहते थे। विक्रम ने अपने परिवार को भी इस रिश्ते के बारे में बताया था।

लेकिन कारगिल युद्ध ने उनकी जिंदगी की कहानी बदल दी। 7 जुलाई 1999 को विक्रम की शहादत के साथ दोनों की शादी का सपना अधूरा रह गया।

विक्रम के पिता गिरधारी लाल बत्रा और उनके जुड़वां भाई विशाल बत्रा ने बाद के इंटरव्यू में इस रिश्ते के बारे में खुलकर बात की। परिवार के मुताबिक विक्रम की शहादत के बाद डिंपल को समझाया गया कि वह जिंदगी में आगे बढ़ें और शादी कर लें, लेकिन डिंपल ने किसी और से शादी नहीं की। उन्होंने विक्रम की यादों के साथ जीवन बिताने का फैसला किया।

डिंपल लंबे समय तक विक्रम के परिवार के संपर्क में भी रहीं। विक्रम के पिता ने एक इंटरव्यू में बताया था कि वह उनके और विक्रम की मां के जन्मदिन पर फोन करती थीं।

बेटे की यादों को संजोते रहे माता-पिता

विक्रम की मां कमल कांता बत्रा ने बेटे की शहादत के बाद राजनीति में भी कदम रखा था। वह 2014 में आम आदमी पार्टी के टिकट पर हिमाचल प्रदेश की हमीरपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ी थीं, हालांकि बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी। उनका 2014 में निधन हो गया।

विक्रम के पिता गिरधारी लाल बत्रा ने लंबे समय तक बेटे की वीरता और उससे जुड़ी स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया। उनका फरवरी 2024 में पालमपुर में निधन हो गया।

मां-पिता चले गए, लेकिन ‘शेरशाह’ की कहानी आज भी जिंदा

कैप्टन विक्रम बत्रा की जिंदगी सिर्फ युद्ध के मैदान में दिखाई गई वीरता की कहानी नहीं है। एक तरफ 24 साल का वह नौजवान था, जिसने देश के लिए अपनी जान दे दी और दूसरी तरफ पीछे छूट गया परिवार और एक ऐसी प्रेम कहानी, जो शादी तक नहीं पहुंच सकी।

उनके सर्वोच्च बलिदान के लिए कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। आज भी कारगिल की प्वाइंट 4875 चोटी और “ये दिल मांगे मोर” का उद्घोष उस 24 वर्षीय ‘शेरशाह’ की याद दिलाता है, जिसने कहा नहीं बल्कि अपने बलिदान से साबित कर दिया कि उसके लिए देश सबसे पहले था।