गौमुख से जल लाना क्यों माना जाता है सबसे कठिन कांवड़ यात्रा?
यह कांवड़ यात्रा का पहला और आखिरी छोर है। गंगोत्री से गौमुख की दूरी करीब 27 किलोमीटर है और यह वीडियो उसी दुर्गम रास्ते का है। हरिद्वार से जहां हर साल 3 से 4 करोड़ शिवभक्त कांवड़ उठाते हैं, वहीं सावन माह में गौमुख से जल लेने पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या महज 1 से 2 हजार के बीच होती है। अधिक बारिश होने पर यह रास्ता भी बंद कर दिया जाता है।
गंगोत्री तक तो वाहनों का आवागमन है, लेकिन इससे ऊपर पहाड़ी रास्तों पर पैदल चलकर ही गौमुख पहुंचा जाता है। वह भी एकदिन मे वापसी करनी होती है, बीच में कहीं भी ठहराव नही है, गंगोत्री से सुबह 4 या 5 बजे पैदल चलकर उसी दिन रात के 8 बजे से पहले वापसी बहुत ही मुश्किल होती है। बरसात में शाम 5 बजते ही अंधेरा होने लगता है फिर कुछ घंटे मोबाइल की रोशनी में ही तय करने पड़ते हैं।
गौमुख के जिस पहाड़ यानी ग्लेशियर से गंगा निकली है उसे नजदीक से देखने पर आँखें चकाचौंध होने लग जाती हैं, बर्फ के बड़े बड़े सिल्ले पत्थरों में लगकर टूटते हैं और फिर जल में तब्दील होते हैं। ऊपर से टूट टूटकर आते हुए बर्फ के टुकड़े 26- 27 किमी दूर आकर गंगोत्री तक लहरों में ऊफनते हुए दिखाई देते हैं।
गंगोत्री में ही मां गंगा का भव्य मंदिर है, जहां लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। लेकिन गौमुख तक पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं। सीमित संख्या में श्रद्धालुओं को ही अनुमति मिलती है और मौसम खराब होने पर रास्ता तुरंत बंद कर दिया जाता है। यही वजह है कि करोड़ों कांवड़ियों की आस्था का स्रोत बनने वाला गौमुख हर साल सिर्फ चुनिंदा शिवभक्तों का ही साक्षी बन पाता है।
कांवड़ यात्रा की सबसे बड़ी भीड़ हरिद्वार में दिखाई देती है, लेकिन उसकी सबसे कठिन तपस्या गौमुख के रास्ते पर होती है। यहां हर कदम आस्था, धैर्य और साहस की परीक्षा लेता है। मां गंगा के उद्गम के दर्शन के साथ ही श्रद्धालुओं की कठिन यात्रा सफल मानी जाती है और यही अनुभव जीवनभर उनकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक स्मृतियों में शामिल हो जाता है।