Thursday, 17 September 2026 |  मेरठ, उत्तर प्रदेश
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चौधरी चरण सिंह ने जिस मुलायम को बढ़ाया, उसी ने बेटे अजीत की रोक दी CM की राह… सांसद सांगवान के वार से फिर खुला 1989 का सियासी अध्याय

चौधरी चरण सिंह ने जिस मुलायम को बढ़ाया, उसी ने बेटे अजीत की रोक दी CM की राह… सांसद सांगवान के वार से फिर खुला 1989 का सियासी अध्याय
  1. अखिलेश  के ‘चवन्नी को रुपया बनाया’ वाले तंज पर बागपत सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान का तीखा पलटवार—आज जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि में हैं, उसमें चौधरी चरण सिंह और अजीत सिंह का ही योगदान

दिल्ली/मेरठ। अखिलेश यादव के “हमने चवन्नी का रुपया बना दिया, हमें छोड़कर चले गए” वाले तंज ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में करीब चार दशक पुराना वह सियासी अध्याय फिर खोल दिया है, जिसकी टीस चौधरी परिवार और उसके समर्थकों की राजनीति में लंबे समय तक महसूस की जाती रही।

बागपत सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान ने अखिलेश यादव पर पलटवार करते हुए सीधे उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि का सवाल उठा दिया है। सांगवान का कहना है कि अखिलेश को ऐसा बयान देने से पहले यह समझना चाहिए कि आज वे जिस राजनीतिक पृष्ठभूमि में खड़े हैं, उसमें चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजीत सिंह का कितना बड़ा योगदान रहा है।

डॉ. राजकुमार सांगवान ने कहा—
अखिलेश यादव आज जिस पृष्ठभूमि में हैं, वह चौधरी चरण सिंह जी की बदौलत है, चौधरी अजीत सिंह जी की बदौलत है। वे विख्यात हैं और आज क्या हैं, किनकी बदौलत हैं, यह उन्हें समझना चाहिए। ऐसे अलग-अलग बयान देने वाले लोगों का दिमाग घूम चुका है।

राजकुमार सांगवान का यह बयान सिर्फ आज की अखिलेश-जयंत सियासी तकरार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक लंबा राजनीतिक इतिहास खड़ा है।

इस इतिहास को समझने के लिए 1989 में लौटना होगा, जब चौधरी चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बेहद करीब पहुंच चुके थे, लेकिन आखिरी वक्त में विधायक दल के भीतर हुए मुकाबले ने पूरा खेल बदल दिया।

चरण सिंह ने खड़ी की किसान राजनीति की जमीन

इस कहानी की शुरुआत मुलायम सिंह यादव से नहीं बल्कि चौधरी चरण सिंह से होती है।

चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति के उन नेताओं में रहे जिन्होंने गांव, किसान और खेत को सत्ता की राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक पहुंचे चरण सिंह ने उत्तर भारत में गैर-कांग्रेसी किसान राजनीति की मजबूत जमीन तैयार की।

उनकी राजनीतिक धारा में अनेक नेता आगे बढ़े। मुलायम सिंह यादव भी उन नेताओं में शामिल थे, जिन्हें चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली राजनीति में आगे बढ़ने और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने का अवसर मिला।

लेकिन 1987 में चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल गईं।

अब उनकी विशाल राजनीतिक विरासत को संभालने की जिम्मेदारी उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह के कंधों पर थी।

और सिर्फ दो साल बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर ऐसा संघर्ष शुरू हुआ, जिसने दोनों राजनीतिक धाराओं के रास्ते बदल दिए।

अमेरिका से लौटे इंजीनियर अजीत सिंह को संभालनी थी पिता की विरासत

चौधरी अजीत सिंह केवल पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे नहीं थे।

वह उस दौर के सबसे उच्च शिक्षित भारतीय राजनेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय और IIT खड़गपुर में पढ़ाई की तथा अमेरिका के Illinois Institute of Technology से भी शिक्षा हासिल की। अमेरिका में तकनीकी क्षेत्र में काम किया और IBM से भी जुड़े।

वह लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे।

लेकिन चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत ने आखिरकार उन्हें राजनीति में ला खड़ा किया।

1986 में वह पहली बार राज्यसभा पहुंचे।

1987 में पिता के निधन के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—

चरण सिंह की बनाई किसान राजनीति और उनके विशाल सामाजिक गठजोड़ को आगे बढ़ाना।

फिर आया 1989 का विधानसभा चुनाव।

1989: जनता दल सबसे बड़ा दल, अजीत के CM बनने की बनी भूमिका

1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त माहौल था।

तत्कालीन 425 सदस्यीय विधानसभा में जनता दल ने 208 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में जगह बनाई। पार्टी अपने दम पर बहुमत से पांच सीट दूर थी, लेकिन समर्थन के सहारे सरकार बनाने का रास्ता साफ था।

अब सबसे बड़ा सवाल था—

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन बनेगा?

दिल्ली की राजनीति में चौधरी अजीत सिंह का नाम सबसे आगे था।

केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे। उत्तर प्रदेश के नेतृत्व को लेकर जो फॉर्मूला सामने आया, उसमें चौधरी अजीत सिंह को मुख्यमंत्री और मुलायम सिंह यादव को उपमुख्यमंत्री बनाने की बात थी।

राजनीतिक गलियारों में अजीत सिंह की ताजपोशी लगभग तय मानी जाने लगी।

यानी चौधरी चरण सिंह के निधन के महज दो साल बाद उनके बेटे के हाथ में उत्तर प्रदेश की सत्ता की कमान आने वाली थी।

लेकिन यहीं कहानी पलट गई।

अजीत CM, मुलायम डिप्टी CM… लेकिन फॉर्मूले पर नहीं बनी बात

मुलायम सिंह यादव उपमुख्यमंत्री बनने के फॉर्मूले से सहमत नहीं हुए।

उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अपनी दावेदारी पेश कर दी और नेतृत्व का फैसला जनता दल के निर्वाचित विधायकों से कराने की मांग की।

अब जिस अजीत सिंह के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता लगभग साफ माना जा रहा था, उन्हें अचानक विधायक दल के अंदर सीधा मुकाबला लड़ना पड़ा।

एक तरफ थे चौधरी चरण सिंह के बेटे और उनकी राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी अजीत सिंह।

दूसरी तरफ थे उसी राजनीतिक धारा में आगे बढ़े मुलायम सिंह यादव।

यहीं से वह अध्याय शुरू होता है जिसे चौधरी परिवार के समर्थकों का एक वर्ग आज भी गुरु के बेटे के साथ राजनीतिक विश्वासघात के नजरिए से देखता है।

तिलक हॉल पहुंची CM की लड़ाई

आखिरकार मुख्यमंत्री का फैसला जनता दल विधायक दल के गुप्त मतदान से कराने का रास्ता निकाला गया।

लखनऊ के विधान भवन परिसर में विधायक दल की बैठक हुई।

अब मुकाबला सीधा था—

चौधरी अजीत सिंह बनाम मुलायम सिंह यादव

अजीत सिंह के समर्थकों को भरोसा था कि चौधरी चरण सिंह की विरासत, केंद्रीय नेतृत्व का समर्थन और उनके पक्ष में माने जा रहे विधायकों की संख्या उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा देगी।

लेकिन इसी दौरान पर्दे के पीछे विधायकों का गणित बदलने लगा।

पर्दे के पीछे बदला गणित, अजीत खेमे में लगी सेंध

1989 के इस पूरे घटनाक्रम में बेनी प्रसाद वर्मा और डीपी यादव के नाम भी राजनीतिक विवरणों में प्रमुखता से आते हैं।

कई विवरणों के मुताबिक मुलायम खेमे ने उन विधायकों पर काम किया जिन्हें पहले अजीत सिंह के पक्ष में माना जा रहा था।

यहां तक दावा किया गया कि अजीत सिंह समर्थक माने जा रहे करीब 11 विधायकों का रुख बदलवाने में मुलायम खेमे के रणनीतिकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

यानी बाहर अजीत सिंह की ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही थी और अंदर संख्या का गणित बदल रहा था।

यही वह सियासी उलटफेर था जिसने मुख्यमंत्री की लगभग तैयार तस्वीर बदल दी।

मतपेटी खुली तो सिर्फ पांच वोट से रह गए अजीत

गुप्त मतदान हुआ।

मतों की गिनती शुरू हुई।

नतीजा आया तो लखनऊ से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक समीकरण बदल चुके थे।

मुलायम सिंह यादव — 115 वोट

चौधरी अजीत सिंह — 110 वोट

अंतर सिर्फ पांच वोट।

चौधरी अजीत सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी से महज पांच वोट दूर रह गए।

जिस नेता को मुख्यमंत्री बनाने का फॉर्मूला सामने आ चुका था और जिसकी ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही थी, वह आखिरी मुकाबले में पांच वोट से पीछे रह गया।

इसके बाद 5 दिसंबर 1989 को मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

लेकिन मुख्यमंत्री की उस कुर्सी के साथ एक राजनीतिक दरार भी पैदा हुई, जिसकी चर्चा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दशकों तक होती रही।

चौधरी समर्थकों ने क्यों माना गुरु के बेटे के साथ धोखा?

चौधरी परिवार के समर्थकों के एक वर्ग के लिए सवाल केवल पांच वोट से हुई हार का नहीं था।

उनकी नाराजगी की वजह इसका राजनीतिक इतिहास था।

जिस चौधरी चरण सिंह ने एक बड़ी किसान और गैर-कांग्रेसी राजनीतिक धारा खड़ी की और जिसमें मुलायम सिंह यादव भी आगे बढ़े, उन्हीं चरण सिंह के निधन के दो साल बाद उनके बेटे अजीत सिंह के मुख्यमंत्री बनने की राह मुलायम की दावेदारी ने रोक दी।

इतिहास में यह तथ्य हमेशा दर्ज रहेगा कि जिस गुरु ने अपने शिष्य को आगे बढ़ाया, उसी ने अपने गुरु के बेटे के सीने में खंजर भोंक दिया।