Thursday, 17 September 2026 |  मेरठ, उत्तर प्रदेश
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ब्रजेश पाठक के एक बयान ने फिर बढ़ाया सुनील भराला का सियासी कद, विरासत में मिली राजनीति को संघर्ष से बनाया अपना मुकाम

ब्रजेश पाठक के एक बयान ने फिर बढ़ाया सुनील भराला का सियासी कद, विरासत में मिली राजनीति को संघर्ष से बनाया अपना मुकाम

गाजियाबाद। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक के एक बयान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्व राज्यमंत्री सुनील भराला के सियासी कद को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। गाजियाबाद के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के कार्यक्रम में पहुंचे ब्रजेश पाठक ने मंच से भराला की तारीफ करते हुए कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश में कहीं भी ब्राह्मण समाज की बात आती है तो सुनील भराला का नाम सबसे पहले आता है।

डिप्टी सीएम के इस बयान को महज मंच से की गई तारीफ भर नहीं माना जा रहा। इसके पीछे सुनील भराला का करीब तीन दशक से अधिक का वह राजनीतिक सफर भी है, जिसमें उन्होंने संगठन, आंदोलन और जमीनी राजनीति के जरिए अपनी पहचान बनाई।

पिता मलखान सिंह से मिली राजनीतिक विरासत

सुनील भराला का परिवार राजनीति और सामाजिक आंदोलनों से पुराना नाता रखता है। उनके पिता पंडित मलखान सिंह भारद्वाज लोकतंत्र सेनानी थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रचारक और विस्तारक रहे तथा भारतीय जनसंघ के दौर से सक्रिय राजनीति से जुड़े रहे। वर्ष 1974 में उन्होंने जनसंघ से चुनाव भी लड़ा था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भी उनके करीबी राजनीतिक संबंध थे।

सुनील भराला को राजनीतिक संस्कार परिवार से जरूर मिले, लेकिन आगे की सियासी पहचान उन्होंने अपने संघर्ष और सक्रियता से बनाई।

छात्र राजनीति से जमीन पर बनाई पहचान

सुनील भराला ने राजनीति को सीधे बड़े पद से शुरू नहीं किया। छात्र जीवन और संगठनात्मक गतिविधियों से निकले भराला ने 90 के दशक से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमीन पर सक्रिय राजनीति के जरिए अपनी पहचान मजबूत करनी शुरू की।

आंदोलन हों, संगठन के कार्यक्रम हों या कार्यकर्ताओं के बीच पहुंचने की राजनीति—भराला लंबे समय तक इसी शैली के नेता के रूप में अपनी जगह बनाते रहे। यही वजह रही कि धीरे-धीरे उनका दायरा मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से निकलकर प्रदेश स्तर तक पहुंचा।

उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी राजनीति से जुड़ी रही है। भराला ने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के साथ कानून की पढ़ाई भी की है।

राज्यमंत्री का दर्जा मिला, लेकिन जमीन से रिश्ता नहीं टूटा

योगी सरकार में सुनील भराला को उत्तर प्रदेश श्रम कल्याण परिषद का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया। सत्ता में पद मिलने के बाद भी भराला लगातार संगठन और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई दिए।

उन्होंने राष्ट्रीय परशुराम परिषद के जरिए देशभर में ब्राह्मण समाज के बीच अपनी सक्रियता और संगठनात्मक नेटवर्क को विस्तार दिया।

सिर्फ ब्राह्मण समाज तक सीमित नहीं भराला की पकड़

सुनील भराला की राजनीतिक पहचान का एक दूसरा पहलू भी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरणों में उनकी सक्रियता केवल ब्राह्मण समाज तक सीमित नहीं मानी जाती। मेरठ और आसपास के क्षेत्र में ब्राह्मणों के साथ त्यागी समाज तथा दूसरे सामाजिक वर्गों के बीच भी उनका संपर्क और राजनीतिक नेटवर्क उनकी ताकत माना जाता रहा है।

ब्रजेश पाठक के बयान के राजनीतिक मायने

ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे 2027 विधानसभा चुनाव की तरफ बढ़ रही है और अलग-अलग राजनीतिक दल सामाजिक समीकरण साधने में जुटे हैं, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक जैसे बड़े ब्राह्मण चेहरे द्वारा सार्वजनिक मंच से सुनील भराला के राजनीतिक कद की तारीफ अपने आप में मायने रखती है।